यूपी में राज्यसभा चुनाव की गर्माहट: भाजपा की नजर 9वीं सीट पर, सपा के बागी विधायकों के रुख पर टिकीं निगाहें

Blog
 Image

लखनऊ। उत्तर प्रदेश की सियासत में आगामी विधानसभा चुनावों से पहले राज्यसभा चुनाव को लेकर सरगर्मियां चरम पर पहुंच गई हैं। प्रदेश का राजनीतिक पारा तेजी से चढ़ने लगा है क्योंकि सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और मुख्य विपक्षी दल समाजवादी पार्टी (सपा) अपने-अपने गणितीय आंकड़ों के आधार पर सीटों का समीकरण साधने में जुट गए हैं। जहां भाजपा अपनी मजबूत संख्या बल के आधार पर आठ सीटों पर जीत लगभग तय मानकर चल रही है, वहीं पार्टी की अब पैनी नजर नौवीं सीट पर भी टिक गई है।

उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव से पहले होने जा रहे राज्यसभा चुनाव ने सियासी हलचल बढ़ा दी है। प्रदेश की 10 राज्यसभा सीटों के लिए 16 अक्टूबर को मतदान होना है और दोनों प्रमुख दल अपने-अपने संख्या बल के साथ अतिरिक्त समर्थन जुटाने की रणनीति पर काम कर रहे हैं। मौजूदा विधानसभा संख्या के आधार पर भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और उसके सहयोगी दल कई सीटों पर मजबूत स्थिति में हैं, लेकिन अतिरिक्त सीट के लिए उसे दूसरे दलों और असंबद्ध विधायकों के समर्थन की जरूरत पड़ सकती है। इसी वजह से समाजवादी पार्टी (सपा) के उन विधायकों पर भी नजर है, जो पिछले राज्यसभा चुनाव में पार्टी लाइन से अलग मतदान कर चुके हैं। राज्यसभा चुनाव में एक सीट के लिए आवश्यक मतों का आंकड़ा उम्मीदवारों की संख्या और वैध मतों के आधार पर तय होता है। मौजूदा गणित में एनडीए खेमे के पास करीब 288-289 विधायक बताए जा रहे हैं, जबकि सपा-कांग्रेस खेमे के पास करीब 103 विधायक हैं। इस संख्या के आधार पर भाजपा के लिए शुरुआती सीटें निकालना अपेक्षाकृत आसान है, लेकिन अतिरिक्त सीटों के लिए उसे अतिरिक्त समर्थन जुटाना होगा। राज्यसभा चुनाव में सबसे ज्यादा चर्चा क्रॉस वोटिंग को लेकर है। पिछले चुनाव में सपा के कुछ विधायकों ने भाजपा प्रत्याशी के पक्ष में मतदान किया था। इनमें कुछ विधायक बाद में भाजपा के साथ चले गए या उनके राजनीतिक समीकरण बदल गए, जबकि कुछ अभी सपा में हैं। ऐसे विधायकों को लेकर दोनों दलों की रणनीति पर नजर बनी हुई है। भाजपा के उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य ने दावा किया है कि सपा के 25 विधायक भाजपा के संपर्क में हैं और पार्टी चुनाव में ‘सरप्राइज’ देगी। वहीं सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने इस दावे को खारिज करते हुए कहा है कि उनकी पार्टी में टूट नहीं है। दोनों नेताओं के बयान फिलहाल राजनीतिक दावों के रूप में सामने आए हैं। सपा भी अपने विधायकों को एकजुट रखने के साथ अतिरिक्त समर्थन जुटाने की कोशिश में है। पार्टी ने राज्यसभा के लिए राम गोपाल यादव और धनराज नाथवानी को उम्मीदवार बनाया है। इसके साथ ही तीसरी सीट को लेकर भी पार्टी की रणनीति चर्चा में रही है। संख्या बल के लिहाज से तीसरी सीट के लिए सपा को अतिरिक्त विधायकों के समर्थन की आवश्यकता होगी। छोटे दलों और निर्दलीय विधायकों की भूमिका भी इस चुनाव में महत्वपूर्ण हो सकती है। एनडीए और सपा-कांग्रेस दोनों खेमे अतिरिक्त वोटों के लिए ऐसे विधायकों के समर्थन पर नजर रखे हुए हैं। यही वजह है कि राज्यसभा चुनाव का मुकाबला केवल घोषित प्रत्याशियों तक सीमित नहीं है, बल्कि विधायकों के मतदान रुख पर भी निगाहें टिकी हैं। राज्यसभा चुनाव ऐसे समय हो रहा है जब उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव की तैयारियां भी तेज हो रही हैं। ऐसे में पार्टियां अपने विधायकों के साथ-साथ छोटे दलों और संभावित क्रॉस वोटिंग के समीकरणों पर भी नजर रख रही हैं। 16 अक्टूबर को होने वाला मतदान यह स्पष्ट करेगा कि मौजूदा संख्या बल के अलावा किस खेमे को अतिरिक्त समर्थन मिलता है। फिलहाल भाजपा अतिरिक्त सीट के लिए समर्थन जुटाने की कोशिश में है, जबकि सपा अपने विधायकों को एकजुट रखने और अपने दावों को मजबूत करने की रणनीति पर काम कर रही है।