Feb 21, 2026

उत्तराखंड में बड़ा शिक्षा सुधार, मदरसा बोर्ड भंग कर नई व्यवस्था लागू करने की तैयारी

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देहरादून। उत्तराखंड में अल्पसंख्यक शिक्षा व्यवस्था बड़े बदलाव की दहलीज पर खड़ी है। राज्य सरकार ने मदरसों के साथ-साथ मुस्लिम, सिख, ईसाई, बौद्ध, जैन और पारसी समुदायों द्वारा संचालित शैक्षणिक संस्थानों के लिए एक समान सिलेबस और नियामक ढांचा लागू करने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। सरकार ने इस पूरी कवायद को 1 जुलाई तक अमलीजामा पहनाने का लक्ष्य तय किया है। यदि योजना समय पर पूरी हुई तो अगले पांच महीनों में मदरसों की किताबें, पाठ्यक्रम और संचालन प्रणाली पूरी तरह बदल सकती है। राज्य सरकार पहले ही उत्तराखंड अल्पसंख्यक शिक्षा अधिनियम लागू कर चुकी है। इसी अधिनियम के तहत राज्य अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण का गठन किया गया है, जो अब सभी अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों की मान्यता, निगरानी और संचालन से जुड़े निर्णय लेगा। सरकार की योजना है कि 1 जुलाई से पहले मदरसा बोर्ड को भंग कर दिया जाए और पूरी व्यवस्था नए प्राधिकरण के अधीन लाई जाए।

अल्पसंख्यक कल्याण विभाग के विशेष सचिव पराग मधुकर धकाते के अनुसार, दो प्रमुख मोर्चों पर काम किया जा रहा है। पहला, ऐसा सिलेबस तैयार करना जो आधुनिक शिक्षा मानकों के अनुरूप हो और छात्रों को विज्ञान, गणित, सामाजिक विज्ञान, भाषा और रोजगारोन्मुखी विषयों में सक्षम बनाए। दूसरा, मदरसों और अन्य अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों के संचालन के लिए स्पष्ट नियम और दंडात्मक प्रावधान तय करना, ताकि मानकों के उल्लंघन की स्थिति में कार्रवाई की जा सके। सरकार का मानना है कि अब तक अल्पसंख्यक संस्थान अलग-अलग बोर्ड और नियमों के तहत संचालित हो रहे थे, जिससे शिक्षा की गुणवत्ता और मानकीकरण में अंतर देखने को मिलता था। नई व्यवस्था के तहत उत्तराखंड बोर्ड के मानकों के अनुरूप पाठ्यक्रम लागू करने की योजना है, ताकि सभी छात्रों को समान शैक्षिक अवसर मिल सकें। हालांकि इस फैसले को लेकर राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर विरोध भी सामने आया है। आजाद अली, अध्यक्ष जन अधिकार पार्टी, ने आरोप लगाया है कि मदरसा बोर्ड को भंग करने का निर्णय बिना व्यापक संवाद के लिया गया है। उनका कहना है कि नए सिलेबस और शिक्षा ढांचे के निर्माण में अल्पसंख्यक समुदाय की राय को पर्याप्त महत्व नहीं दिया गया। उन्होंने संकेत दिए कि यदि समुदाय की आपत्तियों पर ध्यान नहीं दिया गया तो मामला अदालत तक पहुंच सकता है। सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती संतुलन साधने की है। एक ओर आधुनिक शिक्षा, तकनीकी दक्षता और रोजगारपरक पाठ्यक्रम को शामिल करना है, वहीं दूसरी ओर धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान का सम्मान भी सुनिश्चित करना है। सिलेबस निर्माण के दौरान इस संतुलन को बनाए रखने का दावा किया जा रहा है। राज्य अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण की अधिसूचना जारी हो चुकी है और अध्यक्ष सहित कई सदस्यों की नियुक्ति भी की जा चुकी है। नई व्यवस्था के तहत सभी अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थानों को इसी प्राधिकरण से मान्यता लेनी होगी। प्राधिकरण वित्तीय पारदर्शिता और प्रशासनिक जवाबदेही पर भी नजर रखेगा। उत्तराखंड में अल्पसंख्यक शिक्षा व्यवस्था में यह बदलाव ऐतिहासिक माना जा रहा है। आने वाले महीनों में यह स्पष्ट होगा कि यह पहल शिक्षा गुणवत्ता सुधारने की दिशा में मील का पत्थर साबित होती है या नए विवादों को जन्म देती है।