उत्तराखंड की प्रमुख नदियों पर सिंचाई विभाग ने शुरू की चौबीसों घंटे निगरानी व्यवस्था

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देहरादून। उत्तराखंड में मानसून के दौरान संभावित बाढ़ और नदी तटीय क्षेत्रों में आने वाले खतरों को देखते हुए सिंचाई विभाग ने व्यापक और तकनीकी रूप से सशक्त निगरानी व्यवस्था लागू कर दी है। राज्य की 13 प्रमुख नदियों और 12 महत्वपूर्ण बैराजों एवं जलाशयों पर चौबीसों घंटे नजर रखी जाएगी, ताकि किसी भी आपदा की स्थिति में समय रहते लोगों को सतर्क किया जा सके।

सिंचाई विभाग द्वारा तैयार की गई इस विशेष कार्ययोजना के तहत प्रदेशभर में 25 संवेदनशील स्थानों पर जलस्तर की लगातार निगरानी की जाएगी। इन स्थानों पर स्थापित उपकरण नदियों के जलस्तर में होने वाले छोटे से छोटे बदलाव को भी रिकॉर्ड करेंगे। यदि किसी नदी का जलस्तर चेतावनी रेखा या खतरे के निशान के करीब पहुंचता है, तो तत्काल आपदा प्रबंधन विभाग और स्थानीय प्रशासन को अलर्ट जारी किया जाएगा।नोडल अधिकारी पी.के. सिलवाल ने बताया कि इस निगरानी प्रणाली से प्राप्त होने वाले वास्तविक समय के आंकड़े संभावित आपदाओं की पूर्व चेतावनी देने में मदद करेंगे। इससे न केवल जानमाल के नुकसान को कम किया जा सकेगा, बल्कि राहत एवं बचाव कार्यों को भी अधिक प्रभावी और तेज बनाया जा सकेगा। निगरानी के दायरे में अलकनंदा, भागीरथी, गंगा, यमुना, टौंस, काली, गौरी, सरयू, पिंडर, रामगंगा, गोमती और सौंग जैसी प्रमुख नदियां शामिल हैं। वहीं हरिपुर, कोसी, ढेला, फीका, शारदा, तुमड़िया, नानक सागर, पशुलोक, इच्छाड़ी, डाकपत्थर, आसन और भीमगौड़ा बैराजों एवं जलाशयों पर भी विशेष निगरानी रखी जाएगी। विभाग ने इन सभी स्थलों पर वायरलेस संचार प्रणाली और अन्य तकनीकी संसाधनों की व्यवस्था भी सुनिश्चित की है, जिससे किसी भी आपात स्थिति में सूचनाओं का आदान-प्रदान तुरंत हो सके। मानसून के दौरान अक्सर पहाड़ी क्षेत्रों में भारी बारिश के कारण नदियां उफान पर आ जाती हैं, जिससे निचले इलाकों में बाढ़ का खतरा बढ़ जाता है। ऐसे में सिंचाई विभाग की यह पहल राज्य में आपदा प्रबंधन को और अधिक मजबूत बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है। प्रशासन का मानना है कि समय रहते मिलने वाली चेतावनी से हजारों लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सकेगी और संभावित नुकसान को काफी हद तक कम किया जा सकेगा।