सत्य निकेतन हादसा: 7 मौतों का जिम्मेदार कौन? शासन-प्रशासन पर गंभीर सवाल

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नई दिल्ली। राजधानी दिल्ली के सत्य निकेतन इलाके में रविवार दोपहर एक पुरानी इमारत के अचानक ढह जाने से हुए दर्दनाक हादसे ने दिल्ली की इमारतों की सुरक्षा व्यवस्था और अवैध निर्माण पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। हादसे में अब तक सात लोगों की मौत की पुष्टि हुई है, जबकि करीब 10 लोग घायल बताए जा रहे हैं। घायलों में छात्र और मजदूर शामिल हैं, जिनका इलाज एम्स में चल रहा है। वहीं, आशंका जताई जा रही है कि मलबे में अभी भी 15 से 20 लोग दबे हो सकते हैं। इन्हें बाहर निकालने के लिए देर रात तक राहत और बचाव अभियान चलता रहा। हादसे के बाद पूरे इलाके में अफरा-तफरी मच गई। बड़ी संख्या में पुलिस, दमकल और बचाव दल मौके पर पहुंचे और मलबे में फंसे लोगों की तलाश शुरू की गई। आसपास की इमारतों में रहने वाले लोगों को भी सुरक्षा को लेकर चिंता सताने लगी। हादसे के बाद बगल की इमारत के झुकने की बात भी सामने आई है, जिससे आसपास के क्षेत्र में खतरा और बढ़ गया। बताया जा रहा है कि हादसे का शिकार हुई इमारत करीब 40 से 50 साल पुरानी थी। इमारत में पीजी हॉस्टल संचालित किया जा रहा था और बड़ी संख्या में छात्र यहां रह रहे थे। स्थानीय लोगों के मुताबिक, इमारत की ऊपरी मंजिलों पर करीब 20 से 25 छात्र रहते थे। हर कमरे में दो से तीन छात्रों के रहने की बात सामने आई है। इनमें बड़ी संख्या में छात्र केरल, हरियाणा और उत्तर प्रदेश से बताए जा रहे हैं। पढ़ाई और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए दिल्ली आने वाले ये छात्र किराये पर कमरा या बेड लेकर यहां रह रहे थे। बताया जा रहा है कि एक बेड के लिए छात्रों से 12 से 15 हजार रुपये तक किराया लिया जा रहा था। छात्रों और उनके परिवारों के लिए दिल्ली में सुरक्षित आवास की तलाश पहले ही बड़ी चुनौती है। ऐसे में पीजी के नाम पर पुरानी और कमजोर इमारतों में छात्रों को ठहराए जाने की व्यवस्था अब गंभीर सवालों के घेरे में है। हादसे की सबसे अहम कड़ी इमारत के बेसमेंट में चल रहा निर्माण या मरम्मत का काम बताया जा रहा है। जानकारी के मुताबिक, हादसे के वक्त बेसमेंट में काम चल रहा था। स्थानीय लोगों का दावा है कि बेसमेंट में पानी भी भरा हुआ था और इसके बावजूद वहां काम जारी था। यही वजह है कि अब सवाल उठ रहा है कि क्या बेसमेंट में चल रहे काम के कारण इमारत की नींव या संरचना पर असर पड़ा? क्या निर्माण के दौरान सुरक्षा मानकों का पालन किया गया था? क्या किसी सक्षम एजेंसी ने काम की जांच की थी? हादसे को गंभीरता से लेते हुए दिल्ली के एलजी तरनजीत सिंह संधू ने मामले को लेकर हाईलेवल बैठक बुलाई है।

तीन मंजिल की जगह पांच मंजिल कैसे?
हादसे के बाद सबसे बड़ा सवाल इमारत की मंजिलों को लेकर उठ रहा है। स्थानीय स्तर पर दावा किया जा रहा है कि करीब 40-50 साल पुरानी इमारत को मूल रूप से तीन मंजिल के आसपास बनाया गया था, लेकिन बाद में इसे पांच मंजिल तक बढ़ा दिया गया। अगर यह निर्माण स्वीकृत नक्शे के मुताबिक नहीं था तो सवाल है कि अतिरिक्त मंजिलें बनने के दौरान संबंधित विभागों ने कार्रवाई क्यों नहीं की? क्या इमारत का नक्शा स्वीकृत था? अगर था तो उसमें कितनी मंजिलों की अनुमति थी? क्या बाद में अतिरिक्त निर्माण किया गया? और अगर निर्माण अवैध था तो उसे समय रहते रोका क्यों नहीं गया? दिल्ली जैसे महानगर में हजारों पुरानी इमारतें आज भी इस्तेमाल में हैं। इनमें बड़ी संख्या में मकानों को पीजी, हॉस्टल, गेस्ट हाउस और व्यावसायिक गतिविधियों के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है। सत्य निकेतन की घटना ने इस व्यवस्था की निगरानी पर सवाल खड़ा कर दिया है। सवाल यह भी है कि क्या हादसे से पहले संबंधित एजेंसी का कोई अधिकारी इस इमारत की संरचनात्मक स्थिति की जांच करने पहुंचा था? अगर इमारत दशकों पुरानी थी, उसमें अतिरिक्त निर्माण किया गया था और उसमें बड़ी संख्या में छात्र रह रहे थे, तो उसकी सुरक्षा जांच क्यों नहीं हुई? अगर जांच हुई थी तो रिपोर्ट में क्या सामने आया? और अगर इमारत असुरक्षित थी तो उसे खाली क्यों नहीं कराया गया?

दिल्ली की 75 लाख इमारतों की निगरानी कैसे होगी?
राजधानी में बड़ी संख्या में पुरानी इमारतें मौजूद हैं। ऐसे में विशेषज्ञों की मांग है कि केवल हादसे के बाद कार्रवाई करने के बजाय पुरानी इमारतों का व्यापक सर्वे कराया जाए। खासकर वे इमारतें जो 40-50 साल या उससे अधिक पुरानी हो चुकी हैं और जिनमें पीजी, हॉस्टल या अन्य व्यावसायिक गतिविधियां संचालित हो रही हैं, उनकी सुरक्षा जांच प्राथमिकता के आधार पर की जानी चाहिए। स्थानीय स्तर पर यह दावा किया जाता रहा है कि दिल्ली में करीब 75 लाख इमारतें हैं और इनमें से बड़ी संख्या में भवन विभिन्न नियमों और अनुमतियों के सवालों से जुड़े हैं। ऐसे में केवल कुछ भवनों की जांच से समस्या का समाधान नहीं होगा। जरूरत इस बात की है कि पुरानी इमारतों का सर्वे हो, अवैध निर्माण की पहचान की जाए, खतरनाक भवनों को चिन्हित किया जाए और जहां जरूरी हो वहां लोगों को सुरक्षित स्थान पर स्थानांतरित किया जाए।

हादसा या लापरवाही का नतीजा?
हर हादसे के बाद एक सवाल पूछा जाता है, आखिर गलती कहां हुई? लेकिन सत्य निकेतन की घटना इस सवाल को और गंभीर बनाती है। अगर इमारत पुरानी थी, अगर उसमें अतिरिक्त मंजिलें बनी थीं, अगर उसमें पीजी चल रहा था और अगर बेसमेंट में निर्माण कार्य हो रहा था, तो इन सभी पहलुओं की निगरानी की जिम्मेदारी किसकी थी? क्या सिर्फ इमारत मालिक की जिम्मेदारी तय करना पर्याप्त होगा? या उन विभागीय अधिकारियों की भूमिका भी जांची जानी चाहिए, जिनके जिम्मे भवन निर्माण, नक्शे की मंजूरी, अवैध निर्माण पर कार्रवाई और सुरक्षा मानकों की निगरानी है? इन सवालों के जवाब जांच के बाद ही सामने आएंगे, लेकिन इतना साफ है कि मलबा हटने के साथ ही इस हादसे से जुड़े सवाल खत्म नहीं होने वाले।